सामयिक अतुकांत : ‘वाल्मीकि के बेटी’

हाथरस-बूलगड़ी गांव म
घोर कुलयुग
एक नारी
चार-चार अत्याचारी
नियाव के चिहूर
नइ सुनिन कोनो
मरगे दुखियारी
शासन के दबका म
कुल-कुटुम
अउ प्रशासन तो 
भैरा-कोंदा-लुलवा
भइगे अब जांच-फांच
हे! सतयुगी
फटही का?
अभिच्चे फटय,
राम के धरती ताए।
हां!
फेर सीता नोहय,
‘वाल्मीकि’ के बेटी आए।

-  जयंत साहू , डूण्डा-रायपुर छ.ग. 492015
मो- 9826753304

मोर गांव के महिमा : छत्तीसगढ़ी कविता

महिमा हे बड़ भारी, 
महिमा हे भारी। 
सुन संगवारी मोर गांव के 
महिमा हे भारी।। ...

खपरा उपर खपरा जुड़े हे, सरग निंसैनी कस छवाय पटऊंहा छानी।
खदर छानी म घलो गजब बात हे, पैरा-पैरा के तभो नइ चुहे पानी।।
महिमा हे भारी।। ...



छिटका कुरिया अउ गोबर लिपाये भुइया, जिहा बिराजे कुल देवी।
कोला बारी म घलो गजब बात हे, मांदा म बोवाय चेच अउ अमारी।।
महिमा हे भारी।। ...



गोर्रा कस खोली ल राज महल कहे, सुखिया अउ दुखिया बने राजा-रानी।
गांव गली म घलो गजब बात हे, माड़ी भर चिखला ल कुंजन कहे नरनारी।।
महिमा हे भारी।। ...
- जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

छत्तीसगढ़ी श्रम गीत : हरियर-हरियर डोली

हरियर-हरियर डोली म, मेहनत के फर लहराथे।
भाग जगा के खेती म, खेतहारिन ददरिया गावथे।।

मेड़पार म कासी सांवा बदौर, पुरवाही म लहरावथे,
चारो मुड़ा सतरंगी बादर, सरर-सरर गुनगुनावथे।
माथ नवाये डोली म, नंगरिहा ओनहारी जमावथे।। 01
हरियर-हरियर...


लिप-पोत के चतवारे बियारा, धन्हा डोली लुवावथे,
उल्हा-उल्हा दिखे ओन्हारी, खवइया मन लुभावथे।
मिंजा कुटा के कोठी म,अब लछमी दाई समावथे।। 02
हरियर-हरियर...


दाई बर लुगरा ददा ह धोती, मोरो बर कुरता बिसावथे,
तिहार-बार म ठेठरी खुरमी, अउ मेला मड़ई घुमावथे।
नवा-नवा धान के चाउर म,चिला दुधफरा खवावथे।। 03
हरियर-हरियर...

हरियर-हरियर डोली म, मेहनत के फर लहराथे।
भाग जगा के खेती म, खेतहारिन ददरिया गावथे।।
 -  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

मेला मड़ई : छत्तीसगढ़ी गीत

जोही बइला गाड़ी संभराना,
हमु मेला मड़ई किंजर आतेन।
बड़ पावन हे कातिक पुन्नी,
हमु महानदी म नंहा आतेन।।

भीड़-भड़क्का म धीरे हांकव गाड़ी,
दुरिहा रद्दा सुरता लेवा थोरी।
आनी-बानी खजानी के होट होही,
मया के जिनीस बिसा के जोड़ी।
हमु मेला के मजा उड़ा आतेन। जोही...

संगी सहेली संग रईचुली चघे हे,
गजब डेलवा झुले के साध लगे हे।
टिकली फुंदरी ले मन बरे हे,
मया के माहूर ले पांव रचे हे।
हमु ढेलवा म झुल आतेन। जोही...

बिन चिन्हा के हथेरी सुन्ना लागथे,
गोदना वाली के आरो मिलथे।
हाथ म हिरौंदी हीरा नाव लिखाथे,
माहर-माहर येकर इत्तर मिलथे।
हमु मया के चिन्हा गोदा आतेन। जोही...

-  जयंत साहू
पता-: डूण्डा वार्ड नंबर 52 रायपुर छत्तीसगढ़ 492015
Mobile-: 9826753304
Email-: jayantsahu9@gmail.com

नवा बिहान : छत्तीसगढ़ी कविता

सुनता के बिरवा ले जग म सुराज आही,
सुम्मत के दिया ले जग ह अंजोर पाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।

गांव-गली म घलो अक्छर गियान के जोत बरे,
एक हाथ म बइला नांगर दूसर म किताब धरे,
अड़हा अनपढ़ मनखे अब गीता रमायन गाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।


अंधविस्वास अउ भरम के जाल मिटगे,
लड़का लड़की दूनो कुल के दीया बनगे,
समाज ले अब जात-पात के भेद भगाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।

खेती के सेती जागे हे सबके भाग आज,
नित-नियाव बर आगे हे पंचइती राज
अनधन के छांव ले अब गांव सुफल पाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

जिनगी के भेद : छत्तीसगढ़ी अतुकांत रचना

जागेवं बिहनीया लाली सूरुज के चड़ती           
अंगना म उड़ आइस दु चिरइया उड़ती
पिरीत के चोच लड़ई ले चिनहेव नर नारी
कभु डारा म उड़ बईठे कभु उड़य छानी
बिलमगेवं बुता म मैं देख के अनदेख।

बेरा बुड़ती लहूटेव अपन बसुंदरा
नजर म झुलगे काड़ी खुटी के खोंधरा
काड़ी-काड़ी जोर के सिरजाये हेबे पैरा
चहक-चहक के काहय सुघर हे डेरा
जान डरेव ये पंछी बनाहे अपन बसेरा
हरहिंछा होगवं मैं  दिन अउ रतिहा अब।


दूसरइया बिहनीया फेर देखेवं वहू देखय
नर उठे त नारी, नारी उठे त नर राखय
मन मन म गुनेव का ओढ़र ये
खोंधरा ल सुन्ना काबर नई छोड़ये
मन नइ मानिस मैं झांक डरेवं
दाई ददा के पिरा ल मैं भांप डरेवं देख।

पारी-पारी अंडा ले पिला सेवत राहय
पल-पल महू खोधरा ल  पासत रेहवं
गुंजगें अंगना नवा चाहक ले दु ले होगे चार
पांखी सवारे चारा चरावे करके मया दुलार
एक दिन उड़ागे चारो सुन्ना छोड़के अंगना दुवार
मया के माहल भोसकगे, मुठा ले झरगे रेत।
ये खोधरा ले जानेवं मैं  जिनगी के भेद।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

करम : छत्तीसगढ़ी कविता

का करम लिखा के आए हव माथा म,
रेती कस झरत हे मोर मुठा ले।
काहि नइ सिजाएव अपन हाथ म,
तिही बनाए हस तिही मेटा ले।
ये जिनगी तो मेकरा के जाल होगे।
मिही बुनेव मोर बर काल होगे।।


धरम के तराजु म रुपिया चड़े,
देेवता दरस म फिस मांगे पुजेरी।
मंदिर के आगु म मंदहा खड़े,
मोह माया धरे कइसे होववं बइरागी।
मोर सरधा के फुल नपाक होगे।
तन के ठुड़गा गुंगवा के राख होगे।।

तन के परदा ले झांके परोसी,
दुख दरिदरी म हांसे परोसी।
बइमान होके इमान सिखोवे परोसी,
मितवा बन के अनित करे परोसी।
रुंधे बर घरैदा बड़ देरी होगे।
खोंधरा उजारे पवन बइरी होगे।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

आवथे नवा बेरा : छत्तीसगढ़ी कविता

जय जोहार लेलो भइया, आवथे नवा बेरा के,
बच्छर पाछु भइगे, आगू बच्छर लेवथे फेरा।
मजा लेहन मजा लेबेा नवा साल के,
आगे दू हजार आठ बारा बजती के बेरा।।

नसा पानी छोड़े के दिन हे
झगरा लड़ई टोरे के दिन हे
सुनता के संकलप धरे हे
सबो संगी मन परन करे हे
अबतो इही ओड़र म खुसी ल अगोरा।

देवारी कस फटाका फुटे
होरी कस रंग गुलाल उड़े
ईद सहिक सेवइया चुरे
बड़े दिन कस केक बटे
अबतो इहां बधइया देबो अउ लेबो रात पुरा।

पिरीत के फुल धरे बगीया तरी
अमरइया म किंजरे जोगनी परी
गर मिलके भुलाव रिस बइरी
गदर मताए के आगे हे पारी
अबो गुंजय गोहार मन भितरी ले मया पारा।।

बच्छर पाछु भइगे, आगू बच्छर लेवथे फेरा। जय जोहार लेले....

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

जड़काला : छत्तीसगढ़ी कविता

हाय कइसन जड़काला तन मन ल जड़ा डारे,
कमरा हर छुटे ता गोरसी ल पोटारे।
अरे रतिहा ल का कहिबे दिन हा कपा डारे,
सुरुज तिर ठाड़े घाम ल जोहारे।।

ठुनठुनहा लागिस पोहाती वोदिन
कुनकुनहा आगिस घाम थोकिन
बुड़े नइहव तरिया म एकोदिन
अंगोझ डरेव तात पानी म थोकिन
हाय कइसन जड़काला पानी ल कठवा कर डारे। ...


बरी सुक्सी अउ खुला अब चुरय नही
अंगाकर संग बंगाला पुरय नही
साग भाजी ले बारी पलपलाही
तुरते ताजा अब भारी सुहाही
हाय कइजन जड़काला पोचवा ल फुलही कर डारे। ...

कुड़कुड़ाती धुका म भुररी बारे
माइ पिला सबो आंच सेंक डारे
चुलहा म लुकी थोरको नइ ठाहरे
रही रहीके बदरा म लुकी डारे
हाय कइसन जड़काला पछीना ल नोहर कर डारे। ...

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

अंगार बोहे धरती : छत्तीसगढ़ी गीत

अंगार बोहे धरती, अगिन बरसात पुरवाही।
तन होगे गोरसी, तिपइया लोरघत लुकाही।।

लू लगे के डर म, गोंदली बांधेवं गर म।
पनही बिना पांव म, भोंभरा जरेवं गांव म।
पानी पसीया के खंगता म, बिचारी गघरी सुखही।।
अंगार बोहे धरती, अगिन बरसात पुरवाही।
तन होगे गोरसी, तिपइया लोरघत लुकाही।।


कमई धमई उसरे नही, पथरा होगे माटी।
खंती के ढेला उपजे नही, पछीना पिये खेती।
मया छांव संग राहे नही, बईरी घाम सताही।।
अंगार बोहे धरती, अगिन बरसात पुरवाही।
तन होगे गोरसी, तिपइया लोरघत लुकाही।।


सितलंग लागे घेरी-बेरी नहडोरी, तरिया घठौंदा नइ छुटे।
अतलंग पेट अमटाहा म जुडा़ही, सोरियात दही मही पुछे।
हरियर चारा होगे नोहराही, चेच अम्मारी सुहाही।।
अंगार बोहे धरती, अगिन बरसात पुरवाही।
तन होगे गोरसी, तिपइया लोरघत लुकाही।।

-  जयंत साहू
डूण्डा- रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

कुवांरा के गोठ : छत्तीसगढ़ी गीत

तोला देख-देख जिये के मन करथे जवांरा,
फेर काबर जब-जब तोला देखथवं
मर जथवं कुवांरा।

हिरदे म तही मोर सांस  बनके धड़कथस,
फेर काबर जब-जब मै सांस लेथवं
थम जथे ये जिवरा।


तोर आय ले संझा अउ जाय ले बिहनीया जानेवं,
फेर काबर जब-जब तै आथस
ठाहरे नही ये बेरा।

सुते म तै जागे म तै समाये हस आखी भितरी,
फेर काबर जब-जब तोला देखथव
लजाथे नयन बिचारा।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

बिरहा के आगी : छत्तीसगढ़ी गीत

बिरहा के आगी मोर जीया जरोवथे।
रही-रही के सुरता तोर करेजा करोवथे।।

आसा के तरिया म मया डोंगा तउरथे,
बुड़ोबे के उबारबे मन ड़ोंगहार पुछंथे।
रही-रही के लाहरा मोर धीरज धरोवथे ...
बिरहा के आगी मोर जीया जरोवथे।
रही-रही के सुरता तोर करेजा करोवथे।।

बिते बिसरे तोर संग के बेरा नइ भुलावथे,
सुरता के पेड़वा हर सांस डोरी झुलावथे।
रही-रही के पावन मोर जिवरा डरोवथे ...
बिरहा के आगी मोर जीया जरोवथे।
रही-रही के सुरता तोर करेजा करोवथे।।

नयन के लिगरी म, दुनो नजन लड़थे,
सोन पुतरी परी अब, आसु बन के ढरथे।                                   
रही-रही के आखी मोर, नरवा ढरोवथे ...
बिरहा के आगी मोर जीया जरोवथे।
रही-रही के सुरता तोर करेजा करोवथे।।
-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

छत्तीसगढ़ी कविता : दिन देवारी हे

लिप पोते सुघ्घर भुवना, चउक पुरावत अंगना।
दिन देवारी हे कातिक महिना आरो देवथे सुवना।।

अलिन गलिन ले सखिया बटोरत,
तरिहर नाना तिरिया गावय।
घानी मुंदी झुमर पड़की नाचत,
अंजरी भर अन्न असिद पावय।
कुंभरा गड़े पड़की कड़रा डारे राखी
गोड़िन बोहे मुड़ म सखीया बारे दियना। दिन देवारी हे ...


गौरा चौरा म मोहरी बाजे।
चुंदी छरीयाए बइगीन झुपे,
सोटा मारत बइगा नाचे।
गउरा दुल्हा बउ गउरी दुल्हिन
सरी जग देखय मंगल लगना। दिन देवारी हे ...

गरवा बगराए खैरखा म
गहीरा पारय दोहा।
लउठी चलत अखड़ा डाढ़ म
सहाय करे साहड़ा देवहा।
राउत नाचे अहिर रउतइन लिपे ओरी
सोहई बांधे गर म गउ के होवे पुजन।  दिन देवारी हे ....

-  जयंत साहू
डूण्डा -2 रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

मनखे अबके : छत्तीसगढ़ी कविता

पतियाय के लइक नइये कोनो मनखे अबके।
बघवा बनके बेटा मन दाई ददा ल हबके।।

नानपन म दुख पिरा ले पोसिस तेकर सुध नइये,
डेना पुदगा तोर जामगे त सियान के बुध नइये,
पढ़हंता मन तो पुरखा के चिनहा बरो दिस कबके।
पतियाय के लइक नइये कोनो मनखे अबके।


एक पतरी म बाट बिराज के खवईया,
अब होगे एक दुसर के मुह ले कावरा नंगइया,
भाई-भाई के झगरा म गोसइन घलो दांत चबके।
पतियाय के लइक नइये कोनो मनखे अबके।


अनजान ले जादा चिनहे जाने ह छलथे,
सिधवा के नकाब भीतर लबरा ह पलथे,
हितवा मितवा कस मीठ बोली ये तोर मतलबके।
पतियाय के लइक नइये कोनो मनखे अबके।


जिनगी अरथ बनगे धन दौलत कमाना,
सुख के खोजइ म कतका बदलबे ठिकाना,
गुमान म उड़इया एक दिन सुवा उड़ही सबके।।
पतियाय के लइक नइये कोनो मनखे अबके।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

तिरंगा : छत्तीसगढ़ी कविता

तिरंगा ओड़े रेगय धरती, अहिंसा के पैडगरी म।
उच निच अउ जाति धरम, बोह के एके गघरी म।।

जननी ले बड़े मोर जग महतारी,
जान लड़ाके जेकर करवं रखवारी,
जब विपदा आवे ठाड़े राहवं दुवारी,
जोइधा खोजत रेंगय धरती, अहिंसा के पैडगरी म।


भाई ह भाई ल झन जाहर पियाव,
नता रिस्ता के अपन करव हियाव,
पिरीत बन म बैर के बिरवा झन गड़ियाव,
मया बाटत रेंगय धरती, अहिंसा के पैडगरी म।

हाथ जोरे हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई,
संघरे सकलागे सुराजी बर दाई,
अइसन जाइधा ल कइसे भुलाई,
गौरव गावत रेंगय धरती, अहिंसा के पैडगरी म।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

नंगरिहा : छत्तीसगढ़ी कविता

जाग नंगरिहा भाग जगा ले,
तोर दिन बादर आगे।
बदरी छागे रे ... बरखा आगे रे ...
असाढ़ तोर दुवार आगे।।

बड़े बिहनीया ले खेत-खार जाबे,
काटा खुटी बिन चतवार आबे,
कादी कचरा दुबी बन खेत ले मेड़ पार आगे।


लाली धौरा बइला ल चारा चराडर,
करीया भुरवा पड़वा ल मोटवा डर,
नांगर फंदाही तोर संग नंगरिहा के बत्तर आगे।

घुरवा के खातु कचरा पाल दे,
गाड़ी रावन के बिला भरका पाट दे,
बिजहा जमोडर अब बांवत तोर अधवार आगे।

सरी मंझनीया अरा ररा अरई गड़े,
खेतहारिन घाम ले रुखवा के छांव ठाड़े,
होगे बियारी के बेरा बासी वाली तोर लगवार आगे।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

राउत दोहा : छत्तीसगढ़ी गीत

बन म गरजे बलखर बघवा,             
कोठा म गरजे गोररईया।
खैरखा म गरजे राउत गहिरा,
कारी कुकरी देवे धुरपईया।।


दिन देवारी हे मोर लछमी मईया,
मैं खैरखा म लउठी भांजवं।
लान तेंदु साहर के लउड़ी भईया,
मैं पुरखा के मातर जागवं।।


मेड़ पार म तेलिन रेंगें,
भरका म रेंगें रउतइन।
गाड़ी रावन बरदीहा रेंगें,
हांकत ठाकुर के गइयन।।


दिन देवारी हे मोर देव गोबरधन,
मैं साहड़ा देव के गुन गाववं ।
लान मंजुर पांख के सोहईकरधन,
मैं पुरखा के मातर जागवं।।


रंग मताए दाउ दरागा,
छापर मताए गइयन।
अपन देवारी राउत मातेगा,
काछन निकलत दईहान।।
दिन देवारी हे मोर अखरा के बैताल,
मैं मोहबा के महमाई सुमरवं।
लान चवंर मड़ई के खड़ग ढाल
मैं पुरखा के मातर जागवं।।


चार महिना के चरवाही म,
दुध दही के चंडी जाथे।
दुहना छुटे दसराहा देवारी म,
घर घर माखन मिसरी खाथे।।


दिन देवारी हे मोर गउरा गउरी,
मैं  कुलदाई के चरन पखारवं।
लान कुरुद हाट के कमरा खुमरी,
मैं  पुरखा के मांतर जागवं।।


गाय गछिया ले कोठार भरय,
कोठी छलकय अंनधन ले।
किसन कन्हइया किरपा करय,
फलय फुलय अंगना असिद ले।।


दिन देवारी हे मोर दाउ सउंधीयागा,
मैं यदुवंसी के कुल दिया हरवं।
लान पाटन बजार के कोस्टउहा पागा,
मैं  पुरखा के मांतर जागवं।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

मेला मड़ई के दिन : छत्तीसगढ़ी गीत

हाट बजार भरावथे, मेला मड़ई के दिन आगे।
आनी बानी के जिनीस बेचाथे, लेने देखे तेने मन आगे।।

करार दिन म मेला भराहे, गांव-गांव म मुनादी होगे।
बरार सकेल के नाचा लगाहे, काम बुता के मनाही होगे।।
धन जोरे धनी अगोरथे, ठउका बेरा म नेवताहर आगे।


ओरी-ओरी ओरियागे, पेठा जलेबी के ठेला।
रचरिच-रचरिच बाजथे, रइचुली के मचुलिया।।
फुग्गा घुनघुना के पाछु, नानहे लइका मन भागे।


जिद म अड़े हे बहुरिया, ऐसो लेहू मै तो पैजनीया।
सास मुह टेड़वात काहय, अउ के ठन पहिरबे नचनिया।।
माई पिल्ला बजार करे बर, सियन्हा कर पइसा मांगे।


हिरा हिरैन्दी पेरम धरे, एक दुसर बर चिन्हा लेवे।
कोनो देखे न कोनो पुछे, भिड़ म धक्का के मजा लेवे।।
मया डेलवा के चड़ती म, जम्मो सहेली सकलागे।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

फागुन : छत्तीसगढ़ी कविता

रहस डंडा नांचथे सियाम राधा के रसिक।
सवांग धरे सखा गोपी गवाला के सरिक।।
गांव-गांव गोकुल बन बने हे बिरज।
रंग धरे आ फागुन तोला हे अरज।।

होरी लकड़ी बर खेत खार छान मारय
बारी बखरी के घला उदियान करय
अतलंहा खुटा खभर फइरका डारय
मस्तीयावत मन म अब नइहे धिरज।
रंग धरे आ फागुन तोला हे अरज।।


सराररा गावथे लइका सियान
सुनिहव फाग कबिरा देके धियान
झांझ मंजीरा संग म गुंजथे तान
घिड़कत टासा म नंगारा के हे तरज।
रंग धरे आ फागुन तोला हे अरज।।

गुलाल उड़ाये थरी भर-भर
रंग बरसाये पिचकारी धर-धर
सतरंगी होगे अब करिया बादर
सबला रंगव चिनहे के नइहे गरज।
रंग धरे आ फागुन तोला हे अरज।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

करम के दोना : छत्तीसगढ़ी कविता

किंजर के गली-गली म,
मै करम के दोना तुनथवं।
जिनगा बगरगे जाने कोन गरेरा म,
अब सुख के डारा पाना बिनथवं।।

नइ चाही धन दउलत, नइ मांगत हवं कपड़ा लत्ता।
भुख बाड़गे लइका के नंगत, पसिया पेज देवादे दाता।
कइसे गढ़हे हस भग ल, मै अभागा के ताना सुनथवं।।


काबर आखी मुंदे बइठे हस, ये पथरा के भगवान।
मोला हे रोटी के आस, तोला भोग लगे खीर पकवान।
हाथ पसारे ठाड़हे, मै परसाद म घला हिनावथं।।


कोन जनम के पाप रिहीस, काकर करजा छुटथवं।
कतका भुगतना लिखेहस, यम ल आज पुछथवं।
दया करव दयालू, मै आठो पाहर तोर नाम गुनथवं।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

सामयिक अतुकांत : ‘वाल्मीकि के बेटी’

हाथरस-बूलगड़ी गांव म घोर कुलयुग एक नारी चार-चार अत्याचारी नियाव के चिहूर नइ सुनिन कोनो मरगे दुखियारी शासन के दबका म कुल-कुटुम अउ प्रशासन तो ...

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