नंगरिहा : छत्तीसगढ़ी कविता

जाग नंगरिहा भाग जगा ले,
तोर दिन बादर आगे।
बदरी छागे रे ... बरखा आगे रे ...
असाढ़ तोर दुवार आगे।।

बड़े बिहनीया ले खेत-खार जाबे,
काटा खुटी बिन चतवार आबे,
कादी कचरा दुबी बन खेत ले मेड़ पार आगे।


लाली धौरा बइला ल चारा चराडर,
करीया भुरवा पड़वा ल मोटवा डर,
नांगर फंदाही तोर संग नंगरिहा के बत्तर आगे।

घुरवा के खातु कचरा पाल दे,
गाड़ी रावन के बिला भरका पाट दे,
बिजहा जमोडर अब बांवत तोर अधवार आगे।

सरी मंझनीया अरा ररा अरई गड़े,
खेतहारिन घाम ले रुखवा के छांव ठाड़े,
होगे बियारी के बेरा बासी वाली तोर लगवार आगे।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

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