तिहार के झड़ी : छत्तीसगढ़ी गीत

सावन संग आगे तिहार के झड़ी,
धोवंव नांगर बक्खर अउ मचव गेडी।
आगे हरेली..., आगे हरेली...।

नंगरिहा हर औजार ल सुमरत,
जांगर के आधार ल पुजय।
बत्तर बुलकगे बियासी अगोरत,
नागर के नाहना हर पुछय।
मेहनत संग बधे मितानी जोड़ी।
अन्नपुरना के अछरा हरियावत आगे हरेली...


गेड़ी चड़के बठवा डंग-डंग बाड़त,
रचरिच-रचरिच पउवा बजाय।
माड़ी भर चिखला घुठवा म ठाड़त,
किचीर-काचर म पउरी बचाय।
लइका सियान बनावय खेल गुड़ी।
चिखला माटी के मजा लेवत आगे हरेली...

सखरु बइगा सवनाही रेंगाही,
डीह डोगरी के देवता ल मनाही।
टोनही टमारिन मरघट जाही,
पाये बिदीया के परछो पाही।
आधारात मंतर मार चबाही जड़ी।
कोठा कुरिया म छरा देवत आगे हरेली...

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

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