मेला मड़ई : छत्तीसगढ़ी गीत

जोही बइला गाड़ी संभराना,
हमु मेला मड़ई किंजर आतेन।
बड़ पावन हे कातिक पुन्नी,
हमु महानदी म नंहा आतेन।।

भीड़-भड़क्का म धीरे हांकव गाड़ी,
दुरिहा रद्दा सुरता लेवा थोरी।
आनी-बानी खजानी के होट होही,
मया के जिनीस बिसा के जोड़ी।
हमु मेला के मजा उड़ा आतेन। जोही...

संगी सहेली संग रईचुली चघे हे,
गजब डेलवा झुले के साध लगे हे।
टिकली फुंदरी ले मन बरे हे,
मया के माहूर ले पांव रचे हे।
हमु ढेलवा म झुल आतेन। जोही...

बिन चिन्हा के हथेरी सुन्ना लागथे,
गोदना वाली के आरो मिलथे।
हाथ म हिरौंदी हीरा नाव लिखाथे,
माहर-माहर येकर इत्तर मिलथे।
हमु मया के चिन्हा गोदा आतेन। जोही...

-  जयंत साहू
पता-: डूण्डा वार्ड नंबर 52 रायपुर छत्तीसगढ़ 492015
Mobile-: 9826753304
Email-: jayantsahu9@gmail.com

नवा बिहान : छत्तीसगढ़ी कविता

सुनता के बिरवा ले जग म सुराज आही,
सुम्मत के दिया ले जग ह अंजोर पाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।

गांव-गली म घलो अक्छर गियान के जोत बरे,
एक हाथ म बइला नांगर दूसर म किताब धरे,
अड़हा अनपढ़ मनखे अब गीता रमायन गाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।


अंधविस्वास अउ भरम के जाल मिटगे,
लड़का लड़की दूनो कुल के दीया बनगे,
समाज ले अब जात-पात के भेद भगाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।

खेती के सेती जागे हे सबके भाग आज,
नित-नियाव बर आगे हे पंचइती राज
अनधन के छांव ले अब गांव सुफल पाही।
अबतो गांव-गांव म नवा बिहान आही।।

-  जयंत साहू
डूण्डा - रायपुर छत्तीसगढ़ 492015

सामयिक अतुकांत : ‘वाल्मीकि के बेटी’

हाथरस-बूलगड़ी गांव म घोर कुलयुग एक नारी चार-चार अत्याचारी नियाव के चिहूर नइ सुनिन कोनो मरगे दुखियारी शासन के दबका म कुल-कुटुम अउ प्रशासन तो ...

लोकप्रिय कविता

मैंने पढ़ा